{"product_id":"ab-hum-gum","title":"अब हम गुम हुए | Ab Hum Ghum Huye","description":"\u003cp dir=\"ltr\"\u003e\u003cspan\u003eहमारा जन्म एक परिवेश, एक परंपरा, एक धर्म और लोकसत्यों से भरे समाज के बीच होता है, जहाँ से हमें हमारी प्राथमिक पहचान, हमारा नाम मिलता है। हमारी सोच, पसंद, महत्वाकांक्षाएँ और निर्णय, जिसे हम अपनी स्व-चयनित पहचान कहते हैं, वह भी इन्हीं प्रभावों से जन्मती और सुदृढ़ होती है।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp dir=\"ltr\"\u003e\u003cspan\u003eअब एक पल ठहरकर खुद से पूछिए: इन सब प्रभावों को हटा दें, तो बचता क्या है जो सचमुच आपका अपना है?\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp dir=\"ltr\"\u003e\u003cspan\u003eबाबा बुल्लेशाह के काव्य “अब हम गुम हुए” की व्याख्या में आचार्य प्रशांत इसी मूल प्रश्न को पाठक के सामने रखते हैं। \u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp dir=\"ltr\"\u003e\u003cspan\u003eजीवन में जिन मान्यताओं को हमने अपनी पहचान का नाम दे दिया है, वह वास्तव में अहंकार का नकली ढाँचा है। ‘गुम होना’ कोई खो जाना नहीं है, बल्कि अहंकार के उस ढाँचे का गलना है जिसमें सब उधार की मान्यताएँ, भ्रम और झूठे विश्वास मिटने लगते हैं। इस विगलन को ही संत ‘खुदी के खोने’ से परिभाषित करते हैं, जहाँ से अपना वास्तविक ‘आप’ पहचानने की संभावना खुलती है। \u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp dir=\"ltr\"\u003e\u003cspan\u003eप्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत वेदांत, गीता और संतवाणी की स्पष्टता के साथ पाठक को ‘गुम होने’ की वास्तविक मौज से अवगत कराते हैं और अपनी उधार की पहचानों के पीछे के तथ्य को जाँचने के लिए आमंत्रित करते हैं।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e \u003c\/p\u003e","brand":"PrashantAdvait Foundation","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":42928625942624,"sku":"Ab_Hum_Gum","price":129.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0602\/0176\/2912\/files\/ab-hum-gum-huye_Shopify_V1_20260711.jpg?v=1783790224","url":"https:\/\/apbooks.acharyaprashant.org\/products\/ab-hum-gum","provider":"Acharya Prashant Books","version":"1.0","type":"link"}