{"product_id":"nahi_mane","title":"नहिं मानै मूढ़ गँवार (Nahin Maanai Moodh Ganvaar)","description":"\u003cp dir=\"ltr\"\u003e\u003cspan\u003eकबीर साहब का भजन “नहिं मानै मूढ़ गँवार” मनुष्य के भीतर बैठी उस आत्मरक्षा की वृत्ति पर प्रकाश डालता है जिसके कारण संतों, ऋषियों और विचारकों को बार-बार एक ही बात को अलग-अलग तरीकों से कहना पड़ता है। बात सीधी होती है, पर अहंकार उसे स्वीकार नहीं करना चाहता।\u003c\/span\u003e\u003cb\u003e\u003c\/b\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp dir=\"ltr\"\u003e\u003cspan\u003eप्रस्तुत पुस्तक में भजन की व्याख्या करते हुए आचार्य प्रशांत बताते हैं कि अहंकार अपनी अलग सत्ता बचाए रखना चाहता है जिसके लिए वह कल्पनाओं, मान्यताओं और झूठी धारणाओं की दीवारें खड़ी करता है, और अपने ही बंधनों को सुरक्षा का नाम दे देता है। संत-जन सदियों से इसी दीवार को तोड़ने का करुणापूर्ण प्रयास करते आए हैं, ताकि मनुष्य अपने बंधनों को देख सके।\u003c\/span\u003e\u003cb\u003e\u003c\/b\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp dir=\"ltr\"\u003e\u003cspan\u003eआचार्य प्रशांत वेदांत के आलोक में बताते हैं कि इन भ्रमों और बंधनों से मुक्ति के लिए आवश्यक है कि मनुष्य अपने भीतर सक्रिय डर, मोह, झूठे आग्रहों और समझने से इनकार करने वाली वृत्ति को प्रत्यक्ष देखे। सज्जन-संगति और संतों की वाणी हमें हमारी वास्तविक स्थिति के सामने खड़ा करती है। जो अहंकार के सुरक्षा के उपायों और अपने बंधनों को और गहराई से समझना चाहते हैं, यह पुस्तक उनके लिए बोधपूर्ण जीवन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e \u003c\/p\u003e","brand":"PrashantAdvait Foundation","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":42785427325024,"sku":"Nahi_Mane","price":129.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0602\/0176\/2912\/files\/S_656709ce-2a86-4408-a213-d1ce24c520a2.png?v=1780468529","url":"https:\/\/apbooks.acharyaprashant.org\/products\/nahi_mane","provider":"Acharya Prashant Books","version":"1.0","type":"link"}