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अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण - 12 (Ashtavakra Gita Bhashya Prakaran - 12)

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अष्टावक्र गीता अद्वैत वेदांत का एक विलक्षण ग्रंथ है, जिसमें ऋषि अष्टावक्र और राजा जनक के बीच हुआ संवाद आत्मज्ञान की चरम संभावना को प्रकट करता है। पिछले प्रकरणों में ऋषि अष्टावक्र द्वारा दिए ज्ञान के परिणामस्वरूप राजा जनक को मिली स्पष्टता व दृष्टि का वर्णन है।

इन श्लोकों में राजा जनक बताते हैं कि कैसे क्रमशः शरीर के कर्मों, वाणी की व्यस्तता और मन की चिंताओं से उनकी पहचान ढीली पड़ती जा रही है, और अंततः वे अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हैं। अब उन्हें न मन को एकाग्र करने का प्रयत्न करना है, न किसी अनुभव को पकड़ना है, न किसी दुख से बचना है, क्योंकि वे अपनी वास्तविकता से परिचित हैं। जो खोजा जा रहा था, वो खोया हुआ नहीं था, ऐसा जानकर अब उनकी खोज समाप्त होती है और सहज स्थितप्रज्ञता प्रकट होती है।

प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत इन गूढ़ श्लोकों की व्याख्या समकालीन जीवन के संदर्भ में करते हैं। उनकी सरल और स्पष्ट व्याख्या आपको यह देखने में सहायता करती है कि मुक्ति कोई भविष्य की उपलब्धि नहीं है; वह केवल उस भ्रम के समाप्त होने का नाम है जिसमें हम स्वयं को कर्ता, भोगता और खोजी मानते रहते हैं।

यह पुस्तक पाठक को किसी नई उपलब्धि का वादा नहीं करती; यह उसे स्वयं के अनावश्यक संघर्षों को पहचानने और छोड़ने की दृष्टि देती है। और जब यह दृष्टि स्पष्ट होती है, तब जीवन के ये संघर्ष और भटकाव समाप्त होने लगते हैं, और व्यक्ति सहजता व स्पष्टता में स्थित होने लगता है।

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अष्टावक्र गीता अद्वैत वेदांत का एक विलक्षण ग्रंथ है, जिसमें ऋषि अष्टावक्र और राजा जनक के बीच हुआ संवाद आत्मज्ञान की चरम संभावना को प्रकट करता है। पिछले प्रकरणों में ऋषि अष्टावक्र द्वारा दिए ज्ञान के परिणामस्वरूप राजा जनक को मिली स्पष्टता व दृष्टि का वर्णन है।

इन श्लोकों में राजा जनक बताते हैं कि कैसे क्रमशः शरीर के कर्मों, वाणी की व्यस्तता और मन की चिंताओं से उनकी पहचान ढीली पड़ती जा रही है, और अंततः वे अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हैं। अब उन्हें न मन को एकाग्र करने का प्रयत्न करना है, न किसी अनुभव को पकड़ना है, न किसी दुख से बचना है, क्योंकि वे अपनी वास्तविकता से परिचित हैं। जो खोजा जा रहा था, वो खोया हुआ नहीं था, ऐसा जानकर अब उनकी खोज समाप्त होती है और सहज स्थितप्रज्ञता प्रकट होती है।

प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत इन गूढ़ श्लोकों की व्याख्या समकालीन जीवन के संदर्भ में करते हैं। उनकी सरल और स्पष्ट व्याख्या आपको यह देखने में सहायता करती है कि मुक्ति कोई भविष्य की उपलब्धि नहीं है; वह केवल उस भ्रम के समाप्त होने का नाम है जिसमें हम स्वयं को कर्ता, भोगता और खोजी मानते रहते हैं।

यह पुस्तक पाठक को किसी नई उपलब्धि का वादा नहीं करती; यह उसे स्वयं के अनावश्यक संघर्षों को पहचानने और छोड़ने की दृष्टि देती है। और जब यह दृष्टि स्पष्ट होती है, तब जीवन के ये संघर्ष और भटकाव समाप्त होने लगते हैं, और व्यक्ति सहजता व स्पष्टता में स्थित होने लगता है।

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