अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण - 13 (Ashtavakra Gita Bhashya Prakaran - 13)
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अष्टावक्र गीता अद्वैत वेदांत का एक अद्वितीय ग्रंथ है, जिसमें ऋषि अष्टावक्र और राजा जनक के बीच हुआ संवाद आत्मज्ञान की परम संभावना को प्रकट करता है। तेरहवें प्रकरण तक आते-आते यह संवाद उस ऊँचाई पर पहुँच जाता है जहाँ गुरु और शिष्य के बीच का भेद लगभग मिट जाता है। इसलिए राजा जनक के वचनों में वही स्पष्टता, वही स्थिरता और वही परिपक्वता झलकती है जो ऋषि अष्टावक्र की वाणी में थी।
प्रकरण 13 के श्लोकों में जनक स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य के दुख का कारण बाहरी परिस्थितियाँ या विषय नहीं हैं, बल्कि उन विषयों के प्रति उसकी अज्ञानपूर्ण धारणाएँ, मान्यताएँ और आशाएँ हैं। शरीर और मन प्रकृति के उपकरण हैं, जो अपने गुणों—सत्त्व, रज और तम—के अनुसार कार्य करते हैं। अहंकार व्यर्थ ही स्वयं को इनका कर्ता मानकर सुख-दुख के जाल में उलझ जाता है। ज्ञानी वह है जो देख लेता है कि प्रकृति अपने स्वभाव से कार्य कर रही है; और जहाँ उसका कोई वश नहीं है—जैसे शरीर का बूढ़ा होना, दूसरों का व्यवहार, या भविष्य की दिशा—वहाँ अधिकार छोड़ देना ही सच्चा पुरुषार्थ है।
प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत इन श्लोकों की व्याख्या अत्यंत सरल, स्पष्ट और समकालीन उदाहरणों के माध्यम से करते हैं। वे दिखाते हैं कि हम अक्सर अज्ञान की जेल में रहते हुए आज़ादी की तस्वीरों से संतुष्ट हो जाते हैं, जबकि वास्तविक मुक्ति का मार्ग उस जेल की दीवारों—अज्ञानपूर्ण मान्यताओं, संस्कारों और धारणाओं—को गिरा देने में है। जब अज्ञान जल जाता है, तब मनुष्य द्वैत के सुख-दुख से ऊपर उठकर सहज आनंद में स्थित हो जाता है। यह पुस्तक आपके लिए इसी आनंद की दिशा जाने का एक आमंत्रण है।
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अष्टावक्र गीता अद्वैत वेदांत का एक अद्वितीय ग्रंथ है, जिसमें ऋषि अष्टावक्र और राजा जनक के बीच हुआ संवाद आत्मज्ञान की परम संभावना को प्रकट करता है। तेरहवें प्रकरण तक आते-आते यह संवाद उस ऊँचाई पर पहुँच जाता है जहाँ गुरु और शिष्य के बीच का भेद लगभग मिट जाता है। इसलिए राजा जनक के वचनों में वही स्पष्टता, वही स्थिरता और वही परिपक्वता झलकती है जो ऋषि अष्टावक्र की वाणी में थी।
प्रकरण 13 के श्लोकों में जनक स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य के दुख का कारण बाहरी परिस्थितियाँ या विषय नहीं हैं, बल्कि उन विषयों के प्रति उसकी अज्ञानपूर्ण धारणाएँ, मान्यताएँ और आशाएँ हैं। शरीर और मन प्रकृति के उपकरण हैं, जो अपने गुणों—सत्त्व, रज और तम—के अनुसार कार्य करते हैं। अहंकार व्यर्थ ही स्वयं को इनका कर्ता मानकर सुख-दुख के जाल में उलझ जाता है। ज्ञानी वह है जो देख लेता है कि प्रकृति अपने स्वभाव से कार्य कर रही है; और जहाँ उसका कोई वश नहीं है—जैसे शरीर का बूढ़ा होना, दूसरों का व्यवहार, या भविष्य की दिशा—वहाँ अधिकार छोड़ देना ही सच्चा पुरुषार्थ है।
प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत इन श्लोकों की व्याख्या अत्यंत सरल, स्पष्ट और समकालीन उदाहरणों के माध्यम से करते हैं। वे दिखाते हैं कि हम अक्सर अज्ञान की जेल में रहते हुए आज़ादी की तस्वीरों से संतुष्ट हो जाते हैं, जबकि वास्तविक मुक्ति का मार्ग उस जेल की दीवारों—अज्ञानपूर्ण मान्यताओं, संस्कारों और धारणाओं—को गिरा देने में है। जब अज्ञान जल जाता है, तब मनुष्य द्वैत के सुख-दुख से ऊपर उठकर सहज आनंद में स्थित हो जाता है। यह पुस्तक आपके लिए इसी आनंद की दिशा जाने का एक आमंत्रण है।

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