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कठोपनिषद् भाष्य भाग - 2 (Kathopanishad Bhashya Bhaag - 2)

Regular price Rs. 159.00
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कृष्ण यजुर्वेद से संबद्ध कठोपनिषद् आत्मज्ञान के शिखर ग्रंथों में से एक है। "कठोपनिषद् भाष्य" श्रृंखला के इस दूसरे भाग में आचार्य प्रशांत प्रथम अध्याय के श्लोक १० से २९ की व्याख्या के माध्यम से यह स्पष्ट करते हैं कि अध्यात्म का अर्थ मन को बहलाने वाली 'सकारात्मकता' नहीं, बल्कि श्रेय (परम हितकारी) और प्रेय (प्रिय लगने वाले भोग) के बीच एक सचेत चुनाव है।

प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य जी नचिकेता के माध्यम से हमें हमारे भीतर के उस अटल मुमुक्षु से परिचित कराते हैं जो किसी भी मध्यमार्ग या प्रलोभन को स्वीकार नहीं करता। नचिकेता का यमराज द्वारा दिए गए स्वर्ग, अप्सराओं और दीर्घायु जैसे 'प्रेय' को बार-बार ठुकराकर केवल 'श्रेय' (आत्मविद्या) पर अडिग रहना दरअसल हमारी अपनी यांत्रिकता और वासनाओं के प्रति सचेत कर एक बुनियादी चुनाव करने के लिए विवश करता है।

यह भाष्य अध्यात्म को कल्पना लोक से खींचकर जीवन के धरातल पर खड़ा करता है। यदि आप अपने भ्रमों को विदा कर उस मर्मभेदी सत्य को जानने का साहस रखते हैं जिसे यमराज भी प्रलोभनों के पीछे छिपाना चाहते थे, तो यह पुस्तक आपके लिए ही है।

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कृष्ण यजुर्वेद से संबद्ध कठोपनिषद् आत्मज्ञान के शिखर ग्रंथों में से एक है। "कठोपनिषद् भाष्य" श्रृंखला के इस दूसरे भाग में आचार्य प्रशांत प्रथम अध्याय के श्लोक १० से २९ की व्याख्या के माध्यम से यह स्पष्ट करते हैं कि अध्यात्म का अर्थ मन को बहलाने वाली 'सकारात्मकता' नहीं, बल्कि श्रेय (परम हितकारी) और प्रेय (प्रिय लगने वाले भोग) के बीच एक सचेत चुनाव है।

प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य जी नचिकेता के माध्यम से हमें हमारे भीतर के उस अटल मुमुक्षु से परिचित कराते हैं जो किसी भी मध्यमार्ग या प्रलोभन को स्वीकार नहीं करता। नचिकेता का यमराज द्वारा दिए गए स्वर्ग, अप्सराओं और दीर्घायु जैसे 'प्रेय' को बार-बार ठुकराकर केवल 'श्रेय' (आत्मविद्या) पर अडिग रहना दरअसल हमारी अपनी यांत्रिकता और वासनाओं के प्रति सचेत कर एक बुनियादी चुनाव करने के लिए विवश करता है।

यह भाष्य अध्यात्म को कल्पना लोक से खींचकर जीवन के धरातल पर खड़ा करता है। यदि आप अपने भ्रमों को विदा कर उस मर्मभेदी सत्य को जानने का साहस रखते हैं जिसे यमराज भी प्रलोभनों के पीछे छिपाना चाहते थे, तो यह पुस्तक आपके लिए ही है।

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