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मोरा हीरा हेरायगा कचरे में | Mora Heera Herayega Kachre Mein

Regular price Rs. 129.00
Sale price Rs. 129.00 Regular price Rs. 250.00 48% Off
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सुविधाएँ, संबंध, जानकारी, उपलब्धियाँ — आज का मानव इन सब पहलुओं में इतना संपन्न है कि आज हमारी समस्या कमी की नहीं, परंतु अधिकता में वास्तविक मूल्य को खो देने की है। कबीर साहब के भजन “मोरा हीरा हेराएगा कचरे में” में कचरा इन्हीं ‘लाभहीन, मूल्यहीन’ विविधताओं के ढेर का प्रतीक है, और हीरा किसी वस्तु का नहीं, एक स्पष्ट व ऊँचे जीवन का प्रतीक है।

आचार्य प्रशांत पुस्तक में सरल व समकालीन उदाहरणों के माध्यम से भजन के मर्म को खोलते हैं। स्थूल इंद्रियाँ और चंचल मन रंगीन, विविध और विस्तृत कचरे की तरफ़ अधिक आकर्षित रहते हैं, और भीतरी स्पष्टता के अभाव में व्यक्ति भर-भरकर कचरा घर ले आता है। यह कचरा असल में हमारे जीवन को कोई सार्थक दिशा नहीं देता, केवल हमारे नए बंधन और ढर्रे बढ़ाता है।

पुस्तक स्पष्ट करती है कि एक सार्थक व ऊँचा जीवन जिज्ञासा व परीक्षण की नींव पर खड़ा होता है। व्यक्ति को लगातार परखते रहना होता है कि जिसे वह हीरा समझ रहा है, कहीं वह असल में कचरा तो नहीं। अन्यथा जीवन इसी कचरे की सुरक्षा में व्यर्थ बीतता जाता है। यह पुस्तक अपने भीतर और बाहर जमा कचरे को पहचानने और उस अमूल्य हीरे की ओर लौटने का निमंत्रण है, जो कभी खोया ही नहीं था, केवल विविध विषयों से ढँका हुआ था।

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सुविधाएँ, संबंध, जानकारी, उपलब्धियाँ — आज का मानव इन सब पहलुओं में इतना संपन्न है कि आज हमारी समस्या कमी की नहीं, परंतु अधिकता में वास्तविक मूल्य को खो देने की है। कबीर साहब के भजन “मोरा हीरा हेराएगा कचरे में” में कचरा इन्हीं ‘लाभहीन, मूल्यहीन’ विविधताओं के ढेर का प्रतीक है, और हीरा किसी वस्तु का नहीं, एक स्पष्ट व ऊँचे जीवन का प्रतीक है।

आचार्य प्रशांत पुस्तक में सरल व समकालीन उदाहरणों के माध्यम से भजन के मर्म को खोलते हैं। स्थूल इंद्रियाँ और चंचल मन रंगीन, विविध और विस्तृत कचरे की तरफ़ अधिक आकर्षित रहते हैं, और भीतरी स्पष्टता के अभाव में व्यक्ति भर-भरकर कचरा घर ले आता है। यह कचरा असल में हमारे जीवन को कोई सार्थक दिशा नहीं देता, केवल हमारे नए बंधन और ढर्रे बढ़ाता है।

पुस्तक स्पष्ट करती है कि एक सार्थक व ऊँचा जीवन जिज्ञासा व परीक्षण की नींव पर खड़ा होता है। व्यक्ति को लगातार परखते रहना होता है कि जिसे वह हीरा समझ रहा है, कहीं वह असल में कचरा तो नहीं। अन्यथा जीवन इसी कचरे की सुरक्षा में व्यर्थ बीतता जाता है। यह पुस्तक अपने भीतर और बाहर जमा कचरे को पहचानने और उस अमूल्य हीरे की ओर लौटने का निमंत्रण है, जो कभी खोया ही नहीं था, केवल विविध विषयों से ढँका हुआ था।

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