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ना मैं धर्मी नाहिं अधर्मी | Na Main Dharmi Naahi Adharmi

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अक्सर व्यक्ति एक चुनाव गलत होने पर क्या करता है — एक और चुनाव, लेकिन विपरीत दिशा में। दाएँ जा रहे थे तो अब बाएँ जाने का चुनाव; नौकरी में संघर्ष था तो व्यापार करने का चुनाव; कहीं रमे हुए थे तो वहाँ से विरति का चुनाव; त्यागी थे तो भोगी हो जाने का चुनाव। माने लगातार सुधार के ऊपरी प्रयासों में रत रहना। 

अद्वैत वेदांत के बुनियादी सूत्र 'नेति-नेति' का सजीव चित्रण करता कबीर साहब का भजन "ना मैं धर्मी नाहिं अधर्मी" दोनों दिशाओं के चुनावों को नकारता है।

प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत भजन के मर्म को वेदांतिक दृष्टि से समझाते हुए बताते हैं कि बुनियादी प्रश्न यह नहीं कि आपने चुनाव क्या किया, बुनियादी प्रश्न यह है कि चुनाव आंतरिक स्पष्टता और बाहरी तथ्यों के आधार पर हुआ या मान्यताओं और सामाजिक प्रभावों के आधार पर। यही आधार व्यक्ति का केंद्र बन जाता है, जिससे वह सारे चुनाव करता है। जब तक केंद्र नहीं बदलता, तब तक बाहरी रूप से विपरीत दिखने वाले चुनाव भी आपके जीवन में कोई मूलभूत अंतर नहीं ला पाते — धर्म या अधर्म, भोग या त्याग, संग या असंग, बंधन या चाहे मुक्ति ही हो।

आधुनिक समय में बेशुमार विकल्पों की उपलब्धता व्यक्ति के स्पष्टता और तथ्यों पर केंद्रित होने को और अधिक महत्वपूर्ण बना देती है। पुस्तक पाठक को विषयों में रम जाने या सबकुछ त्याग देने का समर्थन नहीं करती, बल्कि आज के सामाजिक-मानसिक संकटों को संबोधित करते हुए वह नींव प्रदान करती है जो उन्हें ऊपरी सुधारवादी ढर्रे से आगे जाकर मूल बदलाव की दिशा प्रदान करती है।

 

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अक्सर व्यक्ति एक चुनाव गलत होने पर क्या करता है — एक और चुनाव, लेकिन विपरीत दिशा में। दाएँ जा रहे थे तो अब बाएँ जाने का चुनाव; नौकरी में संघर्ष था तो व्यापार करने का चुनाव; कहीं रमे हुए थे तो वहाँ से विरति का चुनाव; त्यागी थे तो भोगी हो जाने का चुनाव। माने लगातार सुधार के ऊपरी प्रयासों में रत रहना। 

अद्वैत वेदांत के बुनियादी सूत्र 'नेति-नेति' का सजीव चित्रण करता कबीर साहब का भजन "ना मैं धर्मी नाहिं अधर्मी" दोनों दिशाओं के चुनावों को नकारता है।

प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत भजन के मर्म को वेदांतिक दृष्टि से समझाते हुए बताते हैं कि बुनियादी प्रश्न यह नहीं कि आपने चुनाव क्या किया, बुनियादी प्रश्न यह है कि चुनाव आंतरिक स्पष्टता और बाहरी तथ्यों के आधार पर हुआ या मान्यताओं और सामाजिक प्रभावों के आधार पर। यही आधार व्यक्ति का केंद्र बन जाता है, जिससे वह सारे चुनाव करता है। जब तक केंद्र नहीं बदलता, तब तक बाहरी रूप से विपरीत दिखने वाले चुनाव भी आपके जीवन में कोई मूलभूत अंतर नहीं ला पाते — धर्म या अधर्म, भोग या त्याग, संग या असंग, बंधन या चाहे मुक्ति ही हो।

आधुनिक समय में बेशुमार विकल्पों की उपलब्धता व्यक्ति के स्पष्टता और तथ्यों पर केंद्रित होने को और अधिक महत्वपूर्ण बना देती है। पुस्तक पाठक को विषयों में रम जाने या सबकुछ त्याग देने का समर्थन नहीं करती, बल्कि आज के सामाजिक-मानसिक संकटों को संबोधित करते हुए वह नींव प्रदान करती है जो उन्हें ऊपरी सुधारवादी ढर्रे से आगे जाकर मूल बदलाव की दिशा प्रदान करती है।

 

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