प्रेम सीखना पड़ता है (Prem Sikhna Padta Hai)
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‘प्रेम’ शायद मनुष्य द्वारा सबसे अधिक कहा, लिखा और फिर भी सबसे कम समझा गया शब्द है। कवियों ने उसे गीतों में खोजा, कहानियों ने मिलन और विरह में जीया, दर्शन ने उसे समझने की कोशिश की। फिर भी सवाल बना रहता है — क्या प्रेम सचमुच किसी दूसरे से शुरू होता है?
आचार्य प्रशांत प्रेम को देखने की दिशा ही बदल देते हैं। प्रेम किसी को पाना, थामे रखना या अपनी भावनाओं को नाम दे देना नहीं है। प्रेम की शुरुआत अपने ही साथ एक सच्चे संबंध से होती है, अपनी अपेक्षाओं और असुरक्षाओं को ईमानदारी से देखने से। तभी दूसरे के साथ संबंध में भी सच्चाई और प्रेम की संभावना पैदा होती है।
तो जिसे हम प्रेम कहते आए हैं, वह प्रेम है भी या कुछ और?
‘प्रेम सीखना पड़ता है’ इसी प्रश्न से शुरू होने वाली यात्रा है, संबंधों को बदलने से पहले स्वयं को देखने की।
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‘प्रेम’ शायद मनुष्य द्वारा सबसे अधिक कहा, लिखा और फिर भी सबसे कम समझा गया शब्द है। कवियों ने उसे गीतों में खोजा, कहानियों ने मिलन और विरह में जीया, दर्शन ने उसे समझने की कोशिश की। फिर भी सवाल बना रहता है — क्या प्रेम सचमुच किसी दूसरे से शुरू होता है?
आचार्य प्रशांत प्रेम को देखने की दिशा ही बदल देते हैं। प्रेम किसी को पाना, थामे रखना या अपनी भावनाओं को नाम दे देना नहीं है। प्रेम की शुरुआत अपने ही साथ एक सच्चे संबंध से होती है, अपनी अपेक्षाओं और असुरक्षाओं को ईमानदारी से देखने से। तभी दूसरे के साथ संबंध में भी सच्चाई और प्रेम की संभावना पैदा होती है।
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