राम भजा सो जीता जग में | Ram Bhaja So Jeeta Jag Mein
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जीवन के निर्णायक क्षणों में हमारा चुनाव किसके पक्ष में होता है — सच्चाई के, या उस डर के जो कहता है कि दुनिया में झूठ ही जीतता है?
जब सही रास्ता स्पष्ट होता है, तब भी भीतर कोई आवाज़ हमें रोकती क्यों है?
“राम भजा सो जीता जग में” — कबीर साहब द्वारा रचित यह अति सरल भजन आपकी इसी दुविधा को मिटाने की कुंजी है। इस भजन के केंद्र में है “जग”। वे केवल इतना नहीं कह रहे कि “राम भजा सो जीता”, वे कह रहे हैं “राम भजा सो जीता जग में”, इसी जगत में। कबीर के राम उस सत्य के प्रतीक हैं जिसकी मनुष्य को भीतर-ही-भीतर तलाश है। भजने का अर्थ है लगातार याद रखना कि राम से दूरी है। कि अभी पूरा नहीं हूँ, अभी आगे जाना है।
इसी सत्य से हम दूर हो जाते हैं क्योंकि हमें बचपन से सिखाया जाता है कि दुनिया में झूठ, डर और चालाकी ही जीतती है। प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत भजन की व्याख्या करते हुए बताते हैं कि किस प्रकार यही सीख हमें जीवन भर गलत चुनावों की ओर धकेलती है। यह पुस्तक अमूर्त प्रवचन नहीं, निडर, सच्चे और स्पष्टतापूर्ण जीवन की ओर एक कदम है।
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जीवन के निर्णायक क्षणों में हमारा चुनाव किसके पक्ष में होता है — सच्चाई के, या उस डर के जो कहता है कि दुनिया में झूठ ही जीतता है?
जब सही रास्ता स्पष्ट होता है, तब भी भीतर कोई आवाज़ हमें रोकती क्यों है?
“राम भजा सो जीता जग में” — कबीर साहब द्वारा रचित यह अति सरल भजन आपकी इसी दुविधा को मिटाने की कुंजी है। इस भजन के केंद्र में है “जग”। वे केवल इतना नहीं कह रहे कि “राम भजा सो जीता”, वे कह रहे हैं “राम भजा सो जीता जग में”, इसी जगत में। कबीर के राम उस सत्य के प्रतीक हैं जिसकी मनुष्य को भीतर-ही-भीतर तलाश है। भजने का अर्थ है लगातार याद रखना कि राम से दूरी है। कि अभी पूरा नहीं हूँ, अभी आगे जाना है।
इसी सत्य से हम दूर हो जाते हैं क्योंकि हमें बचपन से सिखाया जाता है कि दुनिया में झूठ, डर और चालाकी ही जीतती है। प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत भजन की व्याख्या करते हुए बताते हैं कि किस प्रकार यही सीख हमें जीवन भर गलत चुनावों की ओर धकेलती है। यह पुस्तक अमूर्त प्रवचन नहीं, निडर, सच्चे और स्पष्टतापूर्ण जीवन की ओर एक कदम है।

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