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रहना नहीं देस बिराना है (Rehna Nahin Des Birana Hai)

Regular price Rs. 135.00
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मानव सभ्यता की प्रगति का एक बड़ा प्रयत्न यही रहा है: जीवन को अधिक-से-अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक बनाना। मनुष्य ने बीमारियों से लड़ने की तकनीकें विकसित कीं, यात्रा और संचार के साधन तैयार किए, और प्राकृतिक आपदाओं का पूर्वानुमान लगाना सीखा। मानवता अनिश्चितता को घटाते हुए सुव्यवस्थित जीवन की ओर बढ़ती रही।

पर इस सुव्यवस्था की एक अनदेखी कीमत भी चुकानी पड़ी। जो कष्ट कभी मनुष्य को भीतर की ओर धकेलते थे, ऊपरी सुविधा और सुरक्षा ने उन्हें क्षीण कर दिया। और भीतर का दुख, डर और अपूर्णता जस के तस बने रहे।

कबीर साहब का भजन “रहना नहीं देस बिराना है” किसी संन्यासी का संसार से विदाई गीत नहीं है। यह मनुष्य की चेतना के लिए एक कालातीत संदेश है: तुम्हें सुरक्षा में ठहर जाना नहीं था, आगे बढ़ना था।

वह “देस” जिसे कबीर साहब बिराना कहते हैं, कोई भौगोलिक जगह नहीं है। वह संकरा घेरा है जो हमने ‘अपने’ और ‘पराये’ के बीच में भेद करके खुद ही रचा है। ये ही भेद दुख और द्वेष का कारक है। असल बात किसी देस या उसके विषयों की है ही नहीं, बात उस संकीर्ण व्यक्तित्व की है जिसे हमने अपनी आखिरी सच्चाई मान लिया है।

प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत इस भजन की जीवंत व्याख्या के माध्यम से दिखाते हैं कि अध्यात्म जगत से सही रिश्ता रखने का नाम है। यह पुस्तक जीवन को उसकी पूरी गरिमा के साथ जीने का आमंत्रण है।

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मानव सभ्यता की प्रगति का एक बड़ा प्रयत्न यही रहा है: जीवन को अधिक-से-अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक बनाना। मनुष्य ने बीमारियों से लड़ने की तकनीकें विकसित कीं, यात्रा और संचार के साधन तैयार किए, और प्राकृतिक आपदाओं का पूर्वानुमान लगाना सीखा। मानवता अनिश्चितता को घटाते हुए सुव्यवस्थित जीवन की ओर बढ़ती रही।

पर इस सुव्यवस्था की एक अनदेखी कीमत भी चुकानी पड़ी। जो कष्ट कभी मनुष्य को भीतर की ओर धकेलते थे, ऊपरी सुविधा और सुरक्षा ने उन्हें क्षीण कर दिया। और भीतर का दुख, डर और अपूर्णता जस के तस बने रहे।

कबीर साहब का भजन “रहना नहीं देस बिराना है” किसी संन्यासी का संसार से विदाई गीत नहीं है। यह मनुष्य की चेतना के लिए एक कालातीत संदेश है: तुम्हें सुरक्षा में ठहर जाना नहीं था, आगे बढ़ना था।

वह “देस” जिसे कबीर साहब बिराना कहते हैं, कोई भौगोलिक जगह नहीं है। वह संकरा घेरा है जो हमने ‘अपने’ और ‘पराये’ के बीच में भेद करके खुद ही रचा है। ये ही भेद दुख और द्वेष का कारक है। असल बात किसी देस या उसके विषयों की है ही नहीं, बात उस संकीर्ण व्यक्तित्व की है जिसे हमने अपनी आखिरी सच्चाई मान लिया है।

प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत इस भजन की जीवंत व्याख्या के माध्यम से दिखाते हैं कि अध्यात्म जगत से सही रिश्ता रखने का नाम है। यह पुस्तक जीवन को उसकी पूरी गरिमा के साथ जीने का आमंत्रण है।

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