वारि जाऊँ मैं सतगुरु के (Vaari Jaun Main Satguru Ke)
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गुरु तुम्हें कुछ देता नहीं है, वो तुम्हें पैदा करता है।
प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत, कबीर साहब की इस सुंदर अभिव्यक्ति को पंक्ति-दर-पंक्ति समझाते हैं और स्पष्ट करते हैं कि “वारी जाऊँ” से पहले और ऊपर आता है — भ्रमों का दूर होना। कबीर साहब की वाणी, और आचार्य प्रशांत द्वारा की गई व्याख्या, यह स्पष्ट कर देती है कि समर्पण कोई भावुक क्रिया नहीं — वह ज्ञान की अंतिम परिणति है। यह भजन प्रमाणित करता है कि भक्तियोग और ज्ञानयोग दो अलग मार्ग नहीं, बल्कि एक ही हैं। जब तक ज्ञान द्वारा भ्रमों को काट न दिया जाए, उच्चतम के प्रति समर्पण संभव नहीं।
गुरु की पहचान बाहरी प्रतीकों, परंपराओं या सामाजिक मान्यताओं से नहीं हो सकती। उसे पहले से तयशुदा लक्षणों में बाँधा नहीं जा सकता। गुरु वही — जो दृष्टि दे, न कि सहारा। जिसके माध्यम से भ्रम दूर हों और जीवन में स्पष्टता आ जाए। और तब “वारी जाना” कोई बाहरी अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक सहज धन्यवाद बन जाता है — उस परिवर्तन के लिए जो भीतर घट चुका होता है।
यह पुस्तक गुरु की नहीं, शिष्य के बदलते जीवन की कहानी है, और आप सबके लिए एक भेंट है।
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गुरु तुम्हें कुछ देता नहीं है, वो तुम्हें पैदा करता है।
प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत, कबीर साहब की इस सुंदर अभिव्यक्ति को पंक्ति-दर-पंक्ति समझाते हैं और स्पष्ट करते हैं कि “वारी जाऊँ” से पहले और ऊपर आता है — भ्रमों का दूर होना। कबीर साहब की वाणी, और आचार्य प्रशांत द्वारा की गई व्याख्या, यह स्पष्ट कर देती है कि समर्पण कोई भावुक क्रिया नहीं — वह ज्ञान की अंतिम परिणति है। यह भजन प्रमाणित करता है कि भक्तियोग और ज्ञानयोग दो अलग मार्ग नहीं, बल्कि एक ही हैं। जब तक ज्ञान द्वारा भ्रमों को काट न दिया जाए, उच्चतम के प्रति समर्पण संभव नहीं।
गुरु की पहचान बाहरी प्रतीकों, परंपराओं या सामाजिक मान्यताओं से नहीं हो सकती। उसे पहले से तयशुदा लक्षणों में बाँधा नहीं जा सकता। गुरु वही — जो दृष्टि दे, न कि सहारा। जिसके माध्यम से भ्रम दूर हों और जीवन में स्पष्टता आ जाए। और तब “वारी जाना” कोई बाहरी अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक सहज धन्यवाद बन जाता है — उस परिवर्तन के लिए जो भीतर घट चुका होता है।
यह पुस्तक गुरु की नहीं, शिष्य के बदलते जीवन की कहानी है, और आप सबके लिए एक भेंट है।

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